Class 10 Hindi Solved Paper 2025 Download
[Total No. of Questions : 13]
कक्षा 10वीं अर्द्ध वार्षिक परीक्षा, 2025-26
Class 10th Half Yearly Examination, 2025-26
हिन्दी / HINDI [1001]
सामान्य निर्देश / General Instructions :
- परीक्षार्थी प्रश्न-पत्र के पहले पृष्ठ पर अपना अनुक्रमांक अवश्य लिखें।
Candidate must write his/her Roll Number on the first page of the Question Paper. - प्रत्येक प्रश्न के सामने उसका अंकमान अंकित है।
Marks for every question are indicated alongside. - सभी प्रश्न हल करना अनिवार्य है।
All questions are compulsory.
भाग ‘अ’
प्र.1 निम्नलिखित अपठित गद्यांश को पढ़कर प्रश्नों के उत्तर लिखिए –
जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिन तत्वों की आवश्यकता है, उनको प्राप्त करना ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए। शिक्षा मानव जीवन के लिए वैसी ही है जैसे संगमरमर के टुकड़े के लिए शिल्पकला। फलतः शिक्षा केवल ज्ञानदान ही नहीं करती अपितु व्यवहारकुशलता और सुरुचि के अंकुरों का पोषण भी करती है। वस्तुतः अपने को जीवित रखने के लिए अपने वातावरण तथा उसकी प्रकृति में निज को समझ कर जीवन के अनुकूल कार्यों को करना और प्रतिकूल का निवारण ही शिक्षा का उद्देश्य है। शिक्षा मनुष्य को संस्कारबद्ध कर उसे मानवीय गुणों से विभूषित करती है तथा साथ ही स्वाभिमान से जीना सिखाने में सहायता कर मनुष्य को प्रगति के पथ पर अग्रसर करती है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए – (1)
उत्तर: (अ) शिक्षा का उद्देश्य
(ii) शिक्षा मनुष्य को बनाती है – (1)
उत्तर: (द) उपर्युक्त सभी
(iii) शिक्षा का उद्देश्य है – (1)
उत्तर: (स) जीवन जीने की कला सिखाना
(iv) मनुष्य को प्रगति के पथ पर अग्रसर करती है – (1)
उत्तर: (अ) शिक्षा
प्र.2 निम्नलिखित अपठित पद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए –
चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर देहरी-डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली! उस पथ पर तुम देना फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ पर जावें वीर अनेक।।
चाह नहीं सम्राटों के शव पर देहरी-डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ लेना बनमाली! उस पथ पर तुम देना फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ पर जावें वीर अनेक।।
(i) उपर्युक्त काव्यांश का उचित शीर्षक क्या है? (1)
उत्तर: “पुष्प की अभिलाषा”
(ii) “इठलाना” का शाब्दिक अर्थ क्या है? (1)
उत्तर: घमण्ड करना / अकड़ कर चलना, इतराना।
(iii) फूल ने क्या चाहा है? (1)
उत्तर: फूल ने यह चाहा है कि वह न तो सुरबाला के गहनों में गूँथा जाए, न सम्राटों के शव पर और न देवताओं के सिर पर सजाया जाए, बल्कि बनमाली उसे तोड़कर उस पथ पर फेंक दे जहाँ मातृभूमि पर शीश चढ़ाने वाले वीर सैनिक जाते हैं, ताकि वह उनके चरणों की धूल बन सके।
(iv) इस पद्यांश में निहित संदेश क्या है? (1)
उत्तर: इस पद्यांश का संदेश है कि सच्चा गौरव विलासिता और दिखावे में नहीं, बल्कि देश सेवा और मातृभूमि के लिए बलिदान में है। व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत सुख से ऊपर उठकर राष्ट्र-हित को अपनाना चाहिए।
भाग ‘ब’
प्र.3 संकेत-बिन्दुओं के आधार पर निम्न में से किसी एक विषय पर निबंध लिखिए (लगभग 300 शब्दों में) – (5)
- विद्यार्थी जीवन और खेलकूद
- भ्रष्टाचार
- बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ
विद्यार्थी जीवन और खेलकूद (उदाहरण-उत्तर)
विद्यार्थी जीवन मनुष्य के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था मानी जाती है। इसी समय उसके चरित्र, आदतों और भविष्य की नींव पड़ती है। इस अवस्था में केवल पढ़ाई ही नहीं बल्कि खेलकूद भी बहुत आवश्यक है।
खेलकूद से शरीर स्वस्थ और चुस्त-दुरुस्त रहता है। खेलों से अनुशासन, समयपालन, सहयोग, साहस, संयम और टीम-स्प्रिट जैसे गुण विकसित होते हैं। मैदान में विद्यार्थी जीत-हार दोनों को स्वीकार करना सीखता है, जिससे उसमें धैर्य और सहनशीलता आती है।
खेल और स्वास्थ्य का गहरा सम्बन्ध है। जो विद्यार्थी नियमित रूप से खेलते हैं, उन्हें जल्दी थकान नहीं होती और वे मानसिक तनाव से भी काफी हद तक मुक्त रहते हैं। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है, इसलिए खेल पढ़ाई में भी मददगार बनते हैं।
खेलों के अन्य लाभ भी हैं। खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने से विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास बढ़ता है। वे नियमों का पालन करना, हार को भी सम्मान से स्वीकार करना और ईमानदारी से खेलना सीखते हैं। आगे चलकर यही गुण उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकते हैं।
अन्त में कहा जा सकता है कि विद्यार्थी जीवन में खेलकूद को कभी भी समय की बर्बादी नहीं समझना चाहिए। नियमित पढ़ाई के साथ-साथ प्रतिदिन कुछ समय खेलों के लिए अवश्य निकालना चाहिए, ताकि विद्यार्थी का शारीरिक, मानसिक और नैतिक – तीनों प्रकार से सर्वांगीण विकास हो सके।
विद्यार्थी जीवन मनुष्य के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था मानी जाती है। इसी समय उसके चरित्र, आदतों और भविष्य की नींव पड़ती है। इस अवस्था में केवल पढ़ाई ही नहीं बल्कि खेलकूद भी बहुत आवश्यक है।
खेलकूद से शरीर स्वस्थ और चुस्त-दुरुस्त रहता है। खेलों से अनुशासन, समयपालन, सहयोग, साहस, संयम और टीम-स्प्रिट जैसे गुण विकसित होते हैं। मैदान में विद्यार्थी जीत-हार दोनों को स्वीकार करना सीखता है, जिससे उसमें धैर्य और सहनशीलता आती है।
खेल और स्वास्थ्य का गहरा सम्बन्ध है। जो विद्यार्थी नियमित रूप से खेलते हैं, उन्हें जल्दी थकान नहीं होती और वे मानसिक तनाव से भी काफी हद तक मुक्त रहते हैं। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है, इसलिए खेल पढ़ाई में भी मददगार बनते हैं।
खेलों के अन्य लाभ भी हैं। खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने से विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास बढ़ता है। वे नियमों का पालन करना, हार को भी सम्मान से स्वीकार करना और ईमानदारी से खेलना सीखते हैं। आगे चलकर यही गुण उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकते हैं।
अन्त में कहा जा सकता है कि विद्यार्थी जीवन में खेलकूद को कभी भी समय की बर्बादी नहीं समझना चाहिए। नियमित पढ़ाई के साथ-साथ प्रतिदिन कुछ समय खेलों के लिए अवश्य निकालना चाहिए, ताकि विद्यार्थी का शारीरिक, मानसिक और नैतिक – तीनों प्रकार से सर्वांगीण विकास हो सके।
प्र.4 स्वयं को राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, डाबी का मनीष मानकर प्रधानाचार्य महोदय को खेल सप्ताह आयोजनार्थ एक प्रार्थना पत्र लिखिए। (4)
उत्तर (प्रार्थना-पत्र):
सेवा में,
प्रधानाचार्य महोदय,
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, डाबी (जिला ______)
विषय: विद्यालय में खेल सप्ताह आयोजित करने के सम्बन्ध में प्रार्थना-पत्र।
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं कक्षा 10वीं का छात्र मनीष आपके विद्यालय का नियमित विद्यार्थी हूँ। हमारे विद्यालय में पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद पर भी ध्यान दिया जाता है, परन्तु पिछले कुछ समय से खेल सप्ताह का आयोजन नहीं हो पाया है।
महोदय, खेलकूद से विद्यार्थियों में अनुशासन, सहयोग, नेतृत्व क्षमता, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास जैसे गुण विकसित होते हैं। यदि विद्यालय स्तर पर एक सप्ताह का खेल सप्ताह आयोजित किया जाए तो छात्र-छात्राओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का अच्छा अवसर मिलेगा।
अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया आगामी माह में विद्यालय में खेल सप्ताह आयोजित करने की कृपा करें, जिसमें दौड़, कबड्डी, खो-खो, वॉलीबॉल, लंबी कूद आदि प्रतियोगिताएँ रखी जाएँ। हम सभी विद्यार्थी पूरे उत्साह से इसमें भाग लेंगे और विद्यालय का नाम रोशन करेंगे।
आपकी कृपा के लिए सदा आभारी रहूँगा।
भवदीय
मनीष
कक्षा 10वीं
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, डाबी
सेवा में,
प्रधानाचार्य महोदय,
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, डाबी (जिला ______)
विषय: विद्यालय में खेल सप्ताह आयोजित करने के सम्बन्ध में प्रार्थना-पत्र।
महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं कक्षा 10वीं का छात्र मनीष आपके विद्यालय का नियमित विद्यार्थी हूँ। हमारे विद्यालय में पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद पर भी ध्यान दिया जाता है, परन्तु पिछले कुछ समय से खेल सप्ताह का आयोजन नहीं हो पाया है।
महोदय, खेलकूद से विद्यार्थियों में अनुशासन, सहयोग, नेतृत्व क्षमता, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास जैसे गुण विकसित होते हैं। यदि विद्यालय स्तर पर एक सप्ताह का खेल सप्ताह आयोजित किया जाए तो छात्र-छात्राओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का अच्छा अवसर मिलेगा।
अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया आगामी माह में विद्यालय में खेल सप्ताह आयोजित करने की कृपा करें, जिसमें दौड़, कबड्डी, खो-खो, वॉलीबॉल, लंबी कूद आदि प्रतियोगिताएँ रखी जाएँ। हम सभी विद्यार्थी पूरे उत्साह से इसमें भाग लेंगे और विद्यालय का नाम रोशन करेंगे।
आपकी कृपा के लिए सदा आभारी रहूँगा।
भवदीय
मनीष
कक्षा 10वीं
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, डाबी
अथवा
स्वयं को अनीता मानते हुए अपने पिताजी को एक पत्र लिखिए जिसमें आपकी बोर्ड परीक्षा तैयारी एवं समय प्रबंधन के बारे में बताया गया हो। (4)
उत्तर (पिताजी को पत्र):
प्रिय पिताजी,
सादर प्रणाम। आशा है आप तथा घर के सभी सदस्य स्वस्थ और प्रसन्न होंगे। आपने अपने पत्र में मेरी बोर्ड परीक्षा की तैयारी और समय-प्रबन्धन के बारे में पूछा था, उसी का उत्तर दे रही हूँ।
पिताजी, इस समय विद्यालय में नियमित रूप से पुनरावृत्ति-परीक्षाएँ हो रही हैं। मैं रोज़ सुबह लगभग दो घण्टे और शाम को चार घण्टे पढ़ाई करती हूँ। मैंने अपना समय-तालिका बना लिया है – सुबह के समय गणित और विज्ञान जैसे कठिन विषय पढ़ती हूँ, दोपहर में भाषा-विषय और रात को दिन भर पढ़े हुए का पुनरावर्तन करती हूँ।
समय की बर्बादी न हो, इसलिए मैंने मोबाइल और टीवी से दूरी बना ली है। सप्ताह में एक दिन मैं सैंपल पेपर और पिछले वर्षों के प्रश्न-पत्र हल करती हूँ, ताकि परीक्षा-पैटर्न की अच्छी समझ बनी रहे। बीच-बीच में थोड़ी देर टहलने से मन भी तरोताजा हो जाता है।
आप निश्चिन्त रहें, मैं पूरी लगन और मेहनत से तैयारी कर रही हूँ। मेरा प्रयास रहेगा कि मैं अच्छे अंकों से परीक्षा उत्तीर्ण होकर आपके सपनों को पूरा कर सकूँ। कृपया अपना आशीर्वाद बनाए रखें।
माँ को चरण स्पर्श, छोटे को प्यार।
आपकी बेटी
अनीता
प्रिय पिताजी,
सादर प्रणाम। आशा है आप तथा घर के सभी सदस्य स्वस्थ और प्रसन्न होंगे। आपने अपने पत्र में मेरी बोर्ड परीक्षा की तैयारी और समय-प्रबन्धन के बारे में पूछा था, उसी का उत्तर दे रही हूँ।
पिताजी, इस समय विद्यालय में नियमित रूप से पुनरावृत्ति-परीक्षाएँ हो रही हैं। मैं रोज़ सुबह लगभग दो घण्टे और शाम को चार घण्टे पढ़ाई करती हूँ। मैंने अपना समय-तालिका बना लिया है – सुबह के समय गणित और विज्ञान जैसे कठिन विषय पढ़ती हूँ, दोपहर में भाषा-विषय और रात को दिन भर पढ़े हुए का पुनरावर्तन करती हूँ।
समय की बर्बादी न हो, इसलिए मैंने मोबाइल और टीवी से दूरी बना ली है। सप्ताह में एक दिन मैं सैंपल पेपर और पिछले वर्षों के प्रश्न-पत्र हल करती हूँ, ताकि परीक्षा-पैटर्न की अच्छी समझ बनी रहे। बीच-बीच में थोड़ी देर टहलने से मन भी तरोताजा हो जाता है।
आप निश्चिन्त रहें, मैं पूरी लगन और मेहनत से तैयारी कर रही हूँ। मेरा प्रयास रहेगा कि मैं अच्छे अंकों से परीक्षा उत्तीर्ण होकर आपके सपनों को पूरा कर सकूँ। कृपया अपना आशीर्वाद बनाए रखें।
माँ को चरण स्पर्श, छोटे को प्यार।
आपकी बेटी
अनीता
प्र.5 निम्नलिखित कथनों या सूक्तियों का पल्लवन या भाषा-विस्तार कीजिए – (4)
“जैसी संगति बैठिए तैसोई फल दीन”
उत्तर:
इस लोकोक्ति का अर्थ है कि मनुष्य जिस प्रकार की संगति करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। यदि हम सज्जनों की संगति करते हैं तो हमारे अंदर ईमानदारी, परिश्रम, सहनशीलता जैसे अच्छे गुण आते हैं। वहीं बुरी संगति से आलस्य, झूठ, हिंसा आदि दुर्गुण पैदा हो जाते हैं। बूँद यदि समुद्र में गिरती है तो मोती बन जाती है और नाली में गिरे तो गंदगी का हिस्सा बन जाती है – अंतर केवल संगति का है। इसलिए हमें हमेशा अच्छे, सद्गुणी और आदर्श व्यक्तियों की संगति करनी चाहिए, ताकि हमारा जीवन भी अच्छा और सफल बन सके।
इस लोकोक्ति का अर्थ है कि मनुष्य जिस प्रकार की संगति करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। यदि हम सज्जनों की संगति करते हैं तो हमारे अंदर ईमानदारी, परिश्रम, सहनशीलता जैसे अच्छे गुण आते हैं। वहीं बुरी संगति से आलस्य, झूठ, हिंसा आदि दुर्गुण पैदा हो जाते हैं। बूँद यदि समुद्र में गिरती है तो मोती बन जाती है और नाली में गिरे तो गंदगी का हिस्सा बन जाती है – अंतर केवल संगति का है। इसलिए हमें हमेशा अच्छे, सद्गुणी और आदर्श व्यक्तियों की संगति करनी चाहिए, ताकि हमारा जीवन भी अच्छा और सफल बन सके।
अथवा
निम्नलिखित अवतरण का संक्षेपण एक-तिहाई शब्दों में कीजिए – (4)
राष्ट्रभाषा की आवश्यकता राष्ट्रीय सम्मान की दृष्टि से भी है। अपने को एक ही राष्ट्र के निवासी मानने वाले दो व्यक्ति किसी विदेशी भाषा में बात करें यह हास्यास्पद असंगति है। इस बात का द्योतक भी है कि उस देश में कोई समुन्नत भाषा नहीं है। दूसरे के सामने हाथ पसारना समृद्धि का नहीं, दरिद्रता का चिन्ह है। दूसरे की भाषा से काम चलाना बहुत कुछ वैसा ही है। जिसकी अपनी भाषा है वह दूसरे की भाषा क्यों उधार ले? इससे राष्ट्रीय सम्मान में बट्टा लगता है। विदेशों में जाने पर भारतीयों को अंग्रेजी में बातें करते देखकर वहाँ के निवासी आश्चर्य से पूछ बैठते हैं कि क्या आपकी कोई भाषा नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर दिया जाए। भाषाएँ तो हमारे यहाँ अनेक हैं, एक से एक सुन्दर व समृद्ध। हीन भावना के कारण हम उनको नहीं अपना पाते।
संक्षेपित सार:
किसी देश के लिए उसकी राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक होती है। यदि एक ही देश के नागरिक आपस में विदेशी भाषा में बातें करें तो यह उनकी भाषिक दरिद्रता और हीन भावना को दर्शाता है। अपनी समृद्ध भाषाएँ होते हुए भी यदि हम दूसरे की भाषा पर निर्भर रहें तो राष्ट्रीय सम्मान को आघात पहुँचता है। विदेशों में भारतीयों को अंग्रेजी में बातें करते देख लोग पूछते हैं कि क्या आपकी अपनी कोई भाषा नहीं है? वास्तव में हमारे यहाँ अनेक सुन्दर और समृद्ध भाषाएँ हैं, पर हीन भावना के कारण हम उन्हें नहीं अपना पाते और यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है।
किसी देश के लिए उसकी राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक होती है। यदि एक ही देश के नागरिक आपस में विदेशी भाषा में बातें करें तो यह उनकी भाषिक दरिद्रता और हीन भावना को दर्शाता है। अपनी समृद्ध भाषाएँ होते हुए भी यदि हम दूसरे की भाषा पर निर्भर रहें तो राष्ट्रीय सम्मान को आघात पहुँचता है। विदेशों में भारतीयों को अंग्रेजी में बातें करते देख लोग पूछते हैं कि क्या आपकी अपनी कोई भाषा नहीं है? वास्तव में हमारे यहाँ अनेक सुन्दर और समृद्ध भाषाएँ हैं, पर हीन भावना के कारण हम उन्हें नहीं अपना पाते और यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है।
भाग ‘स’
प्र.6 बहुचयनात्मक प्रश्न (प्रत्येक 1 अंक) – (8×1=8)
(i) “लखनवी अंदाज” पाठ के लेखक हैं – (1)
उत्तर: (स) यशपाल
(ii) “यह दन्तुरित मुस्कान” कविता का केन्द्रीय पात्र है – (1)
उत्तर: (स) बच्चा
(iii) “माता का आँचल / गाता का आँचल” पाठ में लेखक के बचपन का नाम क्या है? (1)
उत्तर: (ब) भोलानाथ
(iv) “साना-साना हाथ जोड़ि” पाठ की लेखिका हैं – (1)
उत्तर: (ब) मधु कांकरिया
(v) “अधिकतर” शब्द में प्रयुक्त प्रत्यय है – (1)
उत्तर: (अ) –तर
(vi) “प्रतिदिन” शब्द में समास है – (1)
उत्तर: (अ) अव्ययीभाव
(vii) कृष्ण ने किसके माध्यम से गोपियों के पास संदेश भेजा था? (1)
उत्तर: (द) उद्धव
उत्तर: (ब) खेती
प्र.7 रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए – (4×1=4)
(i) ‘रमेश’ शब्द ___________ संज्ञा है।
उत्तर: व्यक्तिवाचक संज्ञा
(ii) ‘कामायनी’ __________ द्वारा रचित काव्यकृति है।
उत्तर: जयशंकर प्रसाद
(iii) कर्म के आधार पर क्रिया के __________ भेद होते हैं।
उत्तर: दो (सकर्मक और अकर्मक)
(iv) ‘सुन्दर लड़की नाच रही है’ वाक्य में ‘सुन्दर’ __________ है।
उत्तर: विशेषण (गुणवाचक विशेषण)
प्र.8 निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर प्रश्नों के उत्तर लिखिए – (4)
पूरी बात तो अब पता नहीं, लेकिन लगता है कि देश के अच्छे मूर्तिकारों की जानकारी नहीं होने और अच्छी मूर्ति की लागत अनुमान और उपलब्ध बजट से कहीं बहुत ज्यादा होने के कारण काफी समय ऊहापोह और चिट्ठी-पत्री में बरबाद हुआ होगा और बोर्ड की शासनावधि समाप्त होने की घड़ियों में किसी स्थानीय कलाकार को ही अवसर देने का निर्णय किया गया होगा और अंत में कस्बे के इकलौते हाई स्कूल के इकलौते ड्राइंग मास्टर – मान लीजिए मोतीलाल जी – को ही यह काम सौंप दिया गया होगा, जो महीने भर में मूर्ति बनाकर पटक देने का विश्वास दिला रहे थे।
(i) गद्यांश के आधार पर बताइए कि मूर्ति बनाने का अवसर किसे दिया गया? (1)
उत्तर: स्थानीय कलाकार, कस्बे के हाई स्कूल के ड्राइंग मास्टर मोतीलाल जी को।
(ii) स्थानीय कलाकार को मूर्ति बनाने का कार्य क्यों सौंपा गया? (1)
उत्तर: अच्छे मूर्तिकारों की सही जानकारी न होने और अच्छी मूर्ति की लागत बजट से अधिक होने के कारण अन्त में जल्दी में स्थानीय कलाकार को ही कार्य सौंप दिया गया। (अर्थात कारण – अच्छे मूर्तिकारों का अभाव और कम बजट, दोनों।)
(iii) मूर्ति बनाने वाले कौन थे? (1)
उत्तर: मास्टर मोतीलाल – कस्बे के इकलौते हाई स्कूल के इकलौते ड्राइंग मास्टर।
(iv) मूर्ति बनाने के मार्ग में क्या-क्या परेशानियाँ आई होंगी? (1)
उत्तर: अच्छे मूर्तिकारों का अभाव, अनुमानित लागत का बजट से अधिक होना, निर्णय में देरी और ऊहापोह – ये प्रमुख परेशानियाँ रही होंगी।
अथवा
लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले खीरे के इस्तेमाल का तरीका जानते हैं। ग्राहक के लिए जीरा-मिला नमक और पिसी हुई लाल मिर्च की चुड़िया भी हाजिर कर देते हैं। नवाब साहब ने बहुत करीने से खीरे की फाँकों पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च की सुर्खी बुरक दी।
(i) खीरे के इस्तेमाल का तरीका कौन जानते हैं? (1)
उत्तर: लखनऊ स्टेशन पर खीरा बेचने वाले।
(ii) नवाब साहब ने क्या तैयारी की? (1)
उत्तर: नवाब साहब ने खीरे की फाँकें काटकर उन पर जीरा-मिला नमक और पिसी हुई लाल मिर्च बहुत करीने से बुरकी और उन्हें सजाया।
(iii) नवाब साहब जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च कहाँ से लाए? (1)
उत्तर: खीरा बेचने वाले / अपने पास रखी डिब्बी से ही नमक और मिर्च ली।
(iv) ‘इस्तेमाल’ शब्द का अर्थ लिखिए। (1)
उत्तर: प्रयोग, उपयोग में लाना।
प्र.9 निम्नलिखित पद्यांश को पढ़कर प्रश्नों के उत्तर लिखिए – (4)
मृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी।।
सुर महिषुर हरिजन अरु गाई। हसरें कुल इन्हें पर न सुराई।।
बधे पाप अपकीर्ति हारे। मारतहुं पाव परिअ तुम्हारे।।
कोटि कुलिस सम वचनु तुम्हारा। व्यर्थ धरहू धनु बान कुठारा।।
सुर महिषुर हरिजन अरु गाई। हसरें कुल इन्हें पर न सुराई।।
बधे पाप अपकीर्ति हारे। मारतहुं पाव परिअ तुम्हारे।।
कोटि कुलिस सम वचनु तुम्हारा। व्यर्थ धरहू धनु बान कुठारा।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश के कवि का नाम लिखिए। (1)
उत्तर: गोस्वामी तुलसीदास
(ii) “कोटि कुलिस सम वचनु तुम्हारा” पंक्ति में कौन-सा अलंकार है? (1)
उत्तर: उपमा अलंकार
(iii) ‘हरिजन’ शब्द का अर्थ लिखिए। (1)
उत्तर: हरि (भगवान) के जन – सज्जन, भक्त, गौ-ब्राह्मण आदि।
(iv) लक्ष्मण के अनुसार उनका कुल किस पर आक्रमण नहीं करता? (1)
उत्तर: देवता, ब्राह्मण, हरिजन और गौ आदि पर (निर्दोष, भगवतभक्तों पर) आक्रमण नहीं करता।
(नोट: शब्दानुसार – सुर, महिषुर, हरिजन और गाय पर उनका कुल कभी क्रूरता नहीं करता।)
(नोट: शब्दानुसार – सुर, महिषुर, हरिजन और गाय पर उनका कुल कभी क्रूरता नहीं करता।)
अथवा
“फसल क्या है?
और तो कुछ नहीं –
पहाड़ और नदियों के पानी का जादू है वह,
हाथों के स्पर्श की गरिमा है,
पूरी-काली संदली मिट्टी का गुणधर्म है,
रूपान्तरण है सूरज की किरणों का,
सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का।”
और तो कुछ नहीं –
पहाड़ और नदियों के पानी का जादू है वह,
हाथों के स्पर्श की गरिमा है,
पूरी-काली संदली मिट्टी का गुणधर्म है,
रूपान्तरण है सूरज की किरणों का,
सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का।”
(i) उपयुक्त पद्यांश का शीर्षक लिखिए। (1)
उत्तर: “फसल”
(ii) कवि के अनुसार फसल क्या है? (1)
उत्तर: कवि के अनुसार फसल केवल खेत की उपज नहीं, बल्कि पहाड़ और नदियों के पानी का जादू, हाथों के श्रम का गौरव, काली-संदली मिट्टी का गुणधर्म और सूर्य की किरणों का रूपान्तर है।
(iii) फसल किस-किस का रूपान्तरण है? (1)
उत्तर: सूरज की किरणों और हवा की थिरकन का रूपान्तरण।
(iv) ‘संदली मिट्टी’ से क्या अभिप्राय है? (1)
उत्तर: काली, उपजाऊ और सुगन्धित मिट्टी, जो चन्दन-सी गुणवान प्रतीत होती है।
भाग ‘द’
प्र.10 लघु उत्तरात्मक प्रश्न (उत्तर सीमा लगभग 40 शब्द) – (6×1=6)
(1) स्मृति को पाथेय बनाने से कवि का क्या आशय है?
उत्तर: ‘पाथेय’ का अर्थ यात्रा में सहारा देने वाला साधन है। स्मृति को पाथेय बनाने से कवि का आशय है कि अब उसके जीवन की यात्रा में साथ चलने वाली केवल प्रिय की स्मृतियाँ ही हैं। इन्हीं मधुर यादों के सहारे वह आगे का जीवन जीना चाहता है।
(2) उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है?
उत्तर: गोपियों ने उद्धव के व्यवहार की तुलना कमल के पत्ते से की है, जो पानी में रहकर भी भीगता नहीं, और तेल से भरे घड़े से, जिस पर पानी की एक बूँद भी नहीं ठहरती। अर्थात वे कृष्ण के निकट रहकर भी प्रेम से प्रभावित नहीं होते।
(3) बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वनि का नायक क्यों कहा गया है?
उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ ने शहनाई को मंदिरों और शादियों तक सीमित न रखकर मंच, रेडियो और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया। उन्होंने शहनाई की ध्वनि को विवाह, पर्व-त्योहार और राष्ट्रीय उत्सव जैसे शुभ अवसरों से जोड़ दिया। इसलिए उन्हें शहनाई की मंगलध्वनि का नायक कहा गया है।
(4) नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को बिना खाए ही क्यों फेंक दिया?
उत्तर: नवाब साहब खीरा अधिकतर दिखावे और नवाबी ठाठ के लिए तैयार कर रहे थे। परिस्थितियाँ अनुकूल न होने और वास्तविक खाने की इच्छा न होने के कारण उन्होंने खीरे की फाँकों को केवल सूँघकर खिड़की से बाहर फेंक दिया।
(5) संगतकार किस प्रकार गायक का सहयोग करता है?
उत्तर: संगतकार अपने वाद्य यंत्र से ताल, लय और स्वर का आधार देता है। वह गायक की आवाज़ को सहारा देता है, ऊँच-नीच सुरों पर साथ निभाता है और उचित समय पर ठहराव व उठान देकर गीत को सुन्दर और प्रभावी बनाता है।
(6) ‘साना-साना हाथ जोड़ि’ यात्रावृत्त में भारत के किस क्षेत्र की यात्रा का वर्णन है?
उत्तर: ‘साना-साना हाथ जोड़ि’ यात्रावृत्त में मुख्य रूप से हिमालयी / उत्तर-पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र – विशेषकर सिक्किम, गंगटोक, यूमथांग आदि स्थानों की यात्रा और वहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य व जीवन-संघर्ष का वर्णन है।
प्र.11 दीर्घ उत्तरात्मक प्रश्न (उत्तर सीमा 60–80 शब्द) – (2×3=6)
(1) “यह दन्तुरित मुस्कान” कविता के आधार पर बच्चे से कवि की मुलाकात का शब्द-चित्र प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
कवि की मुलाकात एक छोटे से बच्चे से होती है जो अपनी माँ की गोद में है। माँ की उँगलियाँ बच्चे के मुँह में हैं और बच्चा बार-बार कवि की ओर कनखी मारकर देखता है। जब भी उनकी नज़रें मिलती हैं, बच्चे के चेहरे पर दन्तुरित, निष्कपट मुस्कान खिल उठती है। कवि को लगता है कि इस मुस्कान में मृत-प्राय व्यक्ति में भी जीवन और आशा भर देने की शक्ति है। यही मुस्कान उसके लिए प्रेरणा और जीवन-संदेश बन जाती है।
कवि की मुलाकात एक छोटे से बच्चे से होती है जो अपनी माँ की गोद में है। माँ की उँगलियाँ बच्चे के मुँह में हैं और बच्चा बार-बार कवि की ओर कनखी मारकर देखता है। जब भी उनकी नज़रें मिलती हैं, बच्चे के चेहरे पर दन्तुरित, निष्कपट मुस्कान खिल उठती है। कवि को लगता है कि इस मुस्कान में मृत-प्राय व्यक्ति में भी जीवन और आशा भर देने की शक्ति है। यही मुस्कान उसके लिए प्रेरणा और जीवन-संदेश बन जाती है।
अथवा
संकलित पदों के आधार पर सूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
सूरदास के भ्रमरगीतों में भक्ति, वात्सल्य और श्रृंगार का सुन्दर संगम मिलता है। इनमें बालकृष्ण की चंचलता, शरारत, रूप-माधुर्य तथा गोपियों और यशोदा के स्नेह का मार्मिक चित्रण है। भाषा सरल, सरस और ब्रजभाषा की मधुरता से युक्त है। इन गीतों में भगवान को अपना निकटतम, स्नेही और परिवार के सदस्य की तरह देखा गया है, जिससे पाठक के मन में भी भगवान के प्रति अपनापन और प्रेम जागृत होता है।
सूरदास के भ्रमरगीतों में भक्ति, वात्सल्य और श्रृंगार का सुन्दर संगम मिलता है। इनमें बालकृष्ण की चंचलता, शरारत, रूप-माधुर्य तथा गोपियों और यशोदा के स्नेह का मार्मिक चित्रण है। भाषा सरल, सरस और ब्रजभाषा की मधुरता से युक्त है। इन गीतों में भगवान को अपना निकटतम, स्नेही और परिवार के सदस्य की तरह देखा गया है, जिससे पाठक के मन में भी भगवान के प्रति अपनापन और प्रेम जागृत होता है।
(2) “निबंध संस्कृति” में व्यक्त विचारों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
“निबंध संस्कृति” में लेखक ने बताया कि निबंध केवल परीक्षा की औपचारिक रचना नहीं, बल्कि लेखक की जीवन-दृष्टि और सोच का दर्पण है। अच्छा निबंध वह है जिसमें लेखक के अपने अनुभव, विचार, संवेदना, तर्क और भाषा-कौशल स्वाभाविक रूप से प्रकट हों। रटकर लिखे गए निबंध से रटंत-प्रवृत्ति बढ़ती है और मौलिकता मर जाती है। लेखक का आग्रह है कि विद्यार्थियों में ऐसी निबंध-संस्कृति विकसित की जाए जो उन्हें स्वतंत्र, ईमानदार और रचनात्मक सोच की ओर ले जाए।
“निबंध संस्कृति” में लेखक ने बताया कि निबंध केवल परीक्षा की औपचारिक रचना नहीं, बल्कि लेखक की जीवन-दृष्टि और सोच का दर्पण है। अच्छा निबंध वह है जिसमें लेखक के अपने अनुभव, विचार, संवेदना, तर्क और भाषा-कौशल स्वाभाविक रूप से प्रकट हों। रटकर लिखे गए निबंध से रटंत-प्रवृत्ति बढ़ती है और मौलिकता मर जाती है। लेखक का आग्रह है कि विद्यार्थियों में ऐसी निबंध-संस्कृति विकसित की जाए जो उन्हें स्वतंत्र, ईमानदार और रचनात्मक सोच की ओर ले जाए।
अथवा
मन्नू भंडारी के सफल व्यक्तित्व में उनकी अध्यापिका की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मन्नू भंडारी ने स्वीकार किया है कि उनके सफल व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी अध्यापिका की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वे स्वभाव से संकोची थीं, पर उनकी अध्यापिका ने उन्हें बोलने, लिखने और मंच पर आने के अवसर दिए। उन्होंने डाँटने की जगह समझाकर उनका आत्मविश्वास बढ़ाया और उनकी लेखन-प्रतिभा को पहचानकर उसे दिशा दी। परिणामस्वरूप मन्नू भंडारी आगे चलकर एक सफल और सुप्रसिद्ध लेखिका बन सकीं।
मन्नू भंडारी ने स्वीकार किया है कि उनके सफल व्यक्तित्व के निर्माण में उनकी अध्यापिका की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वे स्वभाव से संकोची थीं, पर उनकी अध्यापिका ने उन्हें बोलने, लिखने और मंच पर आने के अवसर दिए। उन्होंने डाँटने की जगह समझाकर उनका आत्मविश्वास बढ़ाया और उनकी लेखन-प्रतिभा को पहचानकर उसे दिशा दी। परिणामस्वरूप मन्नू भंडारी आगे चलकर एक सफल और सुप्रसिद्ध लेखिका बन सकीं।
प्र.12 निम्न में से किसी एक रचनाकार का जीवन परिचय लिखिए (उत्तर सीमा लगभग 100 शब्द) – (5)
- यशपाल
- जयशंकर प्रसाद
यशपाल – जीवन परिचय (उदाहरण उत्तर)
यशपाल आधुनिक हिन्दी के प्रमुख कथाकार और उपन्यासकार थे। उनका जन्म 3 दिसम्बर 1903 ई. में फिरोज़पुर छावनी (पंजाब) में हुआ। युवावस्था में वे क्रान्तिकारी आन्दोलन से जुड़े और भगत सिंह आदि के साथ स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे। जेल से छूटने के बाद उन्होंने साहित्य-सृजन को ही अपना मुख्य कार्य बना लिया। उनके प्रमुख उपन्यास हैं – ‘दादा कामरेड’, ‘देशद्रोही’, ‘पार्टी कामरेड’, ‘झूठा सच’ आदि। उनकी कहानियों में यथार्थवाद और प्रगतिशील चिन्तन स्पष्ट दिखाई देता है। वे शोषण-विरोधी और समाज-सुधारवादी दृष्टि के लेखक थे। सन् 1976 ई. में उनका निधन हो गया।
यशपाल आधुनिक हिन्दी के प्रमुख कथाकार और उपन्यासकार थे। उनका जन्म 3 दिसम्बर 1903 ई. में फिरोज़पुर छावनी (पंजाब) में हुआ। युवावस्था में वे क्रान्तिकारी आन्दोलन से जुड़े और भगत सिंह आदि के साथ स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे। जेल से छूटने के बाद उन्होंने साहित्य-सृजन को ही अपना मुख्य कार्य बना लिया। उनके प्रमुख उपन्यास हैं – ‘दादा कामरेड’, ‘देशद्रोही’, ‘पार्टी कामरेड’, ‘झूठा सच’ आदि। उनकी कहानियों में यथार्थवाद और प्रगतिशील चिन्तन स्पष्ट दिखाई देता है। वे शोषण-विरोधी और समाज-सुधारवादी दृष्टि के लेखक थे। सन् 1976 ई. में उनका निधन हो गया।
प्र.13 पाठ “राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद” के आधार पर परशुराम की स्वभावगत विशेषताएँ लिखिए। (5)
उत्तर:
“राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद” में परशुराम का स्वभाव उग्र, क्रोधी और अहंकारी रूप में चित्रित है। वे अपने धनुष के टूटने पर अत्यधिक क्रोधित होकर राम और लक्ष्मण पर कटु वचन बरसाते हैं और अपने पराक्रम तथा तपस्या का बार-बार उल्लेख करते हैं, जिससे उनका अहंभाव प्रकट होता है। परन्तु जब उन्हें राम का वास्तविक दिव्य स्वरूप ज्ञात होता है तो वे तुरंत शांत और विनम्र हो जाते हैं। इससे उनके भीतर की भक्ति, न्यायप्रियता और सत्य के आगे झुकने की क्षमता भी दिखाई देती है।
“राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद” में परशुराम का स्वभाव उग्र, क्रोधी और अहंकारी रूप में चित्रित है। वे अपने धनुष के टूटने पर अत्यधिक क्रोधित होकर राम और लक्ष्मण पर कटु वचन बरसाते हैं और अपने पराक्रम तथा तपस्या का बार-बार उल्लेख करते हैं, जिससे उनका अहंभाव प्रकट होता है। परन्तु जब उन्हें राम का वास्तविक दिव्य स्वरूप ज्ञात होता है तो वे तुरंत शांत और विनम्र हो जाते हैं। इससे उनके भीतर की भक्ति, न्यायप्रियता और सत्य के आगे झुकने की क्षमता भी दिखाई देती है।
अथवा
“कितना कम लेकर ये समाज को कितना अधिक वापस लौटा देती है।” इस कथन के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि आम जनता की देश की आर्थिक प्रगति में क्या भूमिका है? (5)
उत्तर:
यह कथन आम जनता के महत्व को प्रकट करता है। साधारण मजदूर, किसान, छोटे दुकानदार और कर्मचारी समाज से बहुत कम लेते हैं, पर अपनी मेहनत, ईमानदारी और निष्ठा से देश को बहुत अधिक दे देते हैं। किसान कम साधनों में भी पूरे देश के लिए अन्न उगाता है, मजदूर कारखानों में दिन-रात काम कर उत्पादन बढ़ाता है, व्यापारी और कर्मचारी सेवा तथा सुविधा प्रदान करते हैं। ये लोग कर भी देते हैं और अपने श्रम से अर्थव्यवस्था को चलाते हैं। इस प्रकार देश की आर्थिक प्रगति की असली रीढ़ आम जनता ही है, जो कम लेकर समाज को बहुत अधिक लौटा देती है।
यह कथन आम जनता के महत्व को प्रकट करता है। साधारण मजदूर, किसान, छोटे दुकानदार और कर्मचारी समाज से बहुत कम लेते हैं, पर अपनी मेहनत, ईमानदारी और निष्ठा से देश को बहुत अधिक दे देते हैं। किसान कम साधनों में भी पूरे देश के लिए अन्न उगाता है, मजदूर कारखानों में दिन-रात काम कर उत्पादन बढ़ाता है, व्यापारी और कर्मचारी सेवा तथा सुविधा प्रदान करते हैं। ये लोग कर भी देते हैं और अपने श्रम से अर्थव्यवस्था को चलाते हैं। इस प्रकार देश की आर्थिक प्रगति की असली रीढ़ आम जनता ही है, जो कम लेकर समाज को बहुत अधिक लौटा देती है।


