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मैं हारा नहीं… | तृतीय श्रेणी शिक्षक ट्रांसफर की दर्दभरी कहानी (कविता)

मैं हारा नहीं…

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बड़े प्रयास के बाद…
एक पल को लगा कि मैं हार गया।

फिर मन ने कहा…

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नहीं…

ये शब्द मेरे लिए नहीं हैं।

मैं हारा नहीं…
मुझे हरा दिया गया।

पर किसने…?

क्या सरकार ने?

क्या व्यवस्था ने?

क्या वर्षों से चली आ रही नीतियों ने?

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नहीं…

उन्होंने तो वही किया,
जो वे वर्षों से करते आए हैं।

अगर किसी ने मुझे हराया है,

तो वह हमारी खामोशी है…
हमारा बिखराव है…
हमारा “मुझे क्या” वाला सोच है।


जब मैंने देखा…

कोई शिक्षक
सैकड़ों किलोमीटर दूर रहकर
बूढ़े माँ-बाप की चिंता में जी रहा है।

किसी के बच्चे
मोबाइल की स्क्रीन पर ही
अपने माता-पिता का इंतज़ार करते हैं।

कोई पति-पत्नी
बरसों से अलग-अलग जिलों में रहकर
सिर्फ़ छुट्टियों में परिवार बन पाते हैं।

कोई दिव्यांग होकर भी
हर सुबह मुस्कुराते हुए विद्यालय पहुँचता है।

कोई गंभीर बीमारी के बावजूद
दर्द छिपाकर बच्चों को पढ़ाता है।

कोई विधवा…
कोई परित्यक्ता…
कोई एकल महिला शिक्षक…

हर कोई…
अपनी-अपनी परिस्थितियों से लड़ते हुए
ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभा रहा है।

समस्या ड्यूटी नहीं है…

समस्या ड्यूटी और परिवार के बीच की दूरी है।

हम ड्यूटी से नहीं भाग रहे…

हम तो बस इतना चाहते हैं कि…

विद्यालय की जिम्मेदारी भी निभे…

और शाम को अपने घर का दरवाज़ा भी खुल सके।

बच्चों का भविष्य भी संवारें…

और अपने बच्चों का बचपन भी देख सकें।

सरकारी सेवा भी पूरी निष्ठा से करें…

और अपने परिवार का साथ भी न छूटे।


इन्हीं चेहरों ने
मुझे चैन से बैठने नहीं दिया।

मैंने आवाज़ उठाई।

ट्विटर पर अभियान चलाया।

टेलीग्राम पर
हज़ारों शिक्षकों को एकजुट करने का प्रयास किया।

हर पोस्ट लिखी।
हर वीडियो बनाया।

हर अपील में सिर्फ़ एक ही सपना था…

हर शिक्षक अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाए…

लेकिन अपने अपनों से दूर रहने की सज़ा न पाए।

लेकिन…

जब साथ खड़े होने का समय आया…

“पहले मेरा काम हो जाए…”

किसी ने पोस्ट साझा नहीं की।
किसी ने एक ट्वीट तक नहीं किया।
किसी ने पाँच मिनट भी नहीं दिए।

और फिर…

“आंदोलन सफल क्यों नहीं हुआ?”


सच कहूँ…

आंदोलन कभी एक व्यक्ति नहीं हारता।

आंदोलन तब हारता है,
जब पीड़ा सबकी एक हो…

लेकिन आवाज़…
सबकी अलग-अलग हो जाए।


आज भी देर नहीं हुई है।

अगर…

पीड़ित शिक्षक…
दिव्यांग शिक्षक…
गंभीर बीमारी से जूझ रहे शिक्षक…
पति-पत्नी…
विधवा…
परित्यक्ता…
एकल महिला…
और उनके साथ हर संवेदनशील शिक्षक…

सिर्फ़ एक बार…
एक आवाज़ बन जाएँ…

तो यक़ीन मानिए…

हम कोई विशेष अधिकार नहीं माँग रहे।

हम कोई एहसान नहीं माँग रहे।

हम तो बस इतना चाहते हैं…

कर्तव्य भी निभे…

और परिवार भी साथ रहे।

ड्यूटी भी ईमानदारी से हो…

और घर तक की दूरी इतनी हो कि रिश्ते ज़िंदा रह सकें।

हम ड्यूटी से नहीं थके हैं…

हम अपनों से दूर रहकर जीने से थक गए हैं।

और जिस दिन…

सभी शिक्षक
इस दर्द को
अपना दर्द समझ लेंगे…

उस दिन…

जीत किसी एक व्यक्ति की नहीं होगी।

जीत हर उस शिक्षक की होगी…

जो वर्षों से
सिर्फ़ एक ट्रांसफर नहीं…

अपने घर लौटने का इंतज़ार कर रहा है।

✍️ इस कविता की प्रत्येक पंक्ति उन शिक्षकों को समर्पित है, जो अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाते हुए भी अपने परिवार से दूर रहने की पीड़ा सह रहे हैं।

— Vinod Garhwal

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