रावण तो ज़िंदा है…
गर पहले जला चुके हो,
तो बार-बार क्यों जलाते हो?
मैंने देखा है रावण को…
फिर हर साल उसी को क्यों जलाते हो?
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मैंने देखा है रावण को
घर-घर में,
हर मन में,
दर्पण में,
सामने वाले में,
भाई में, बहन में,
माँ-बाप में,
सब रिश्तेदारों में,
और सबसे ज़्यादा…
अपने आप में।
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फिर जलाया क्या?
रावण तो ज़िंदा है,
फिर ज़िंदा को जलाते क्यों हो?
मैंने जब-जब क्रोध किया,
गुस्सा किया,
ज़िद को अपनी ताक़त समझा,
अहंकार में अपनों को कम समझा,
तब-तब रावण को पाया…
बड़े करीब से।
मैंने उसे देखा भी,
और दिखाया भी—
खुद को,
मेरे अपनों को,
कभी अपनी बातों में,
कभी अपने व्यवहार में।
लेकिन सच कहूँ…
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रावण को मैं जला न सका,
सच कहूँ तो रावण ने मुझे हराया है।
मेरे रिश्तों को, मेरे दोस्तों को,
मेरी इच्छाओं को, मेरे ख़्वाबों को,
धीरे-धीरे मुझसे दूर भगाया है।
मैं जीतने निकला था दुनिया को,
पर अपने ही भीतर हारता आया हूँ,
जिस रावण को जलाने चला था,
उसी के हाथों सब कुछ गँवाया है।
रावण… रावण… रावण!
कभी वह मेरे भीतर था,
कभी तुम्हारे भीतर दिखाई दिया,
कभी रिश्तों के बीच खड़ा मिला,
कभी अपनों को अपनों से लड़ाता मिला।
तब मन में एक सवाल उठा—
जिस रावण को हम हर साल जलाते हैं,
वह हमारे व्यवहार में
बार-बार ज़िंदा कैसे हो जाता है?
क्या रावण केवल वही है
जिसके दस सिर हैं?
या वह भी रावण है,
जो अपनी गलती मानने से इनकार करता है?
क्या रावण केवल वही है
जिसकी सोने की लंका थी?
या वह भी रावण है,
जिसके मन में अहंकार की लंका है
और रिश्ते उसकी आग में जलते हैं?
क्या रावण केवल वही है
जिसने किसी का अहित किया?
या वह भी रावण है,
जो अपने गुस्से में अपनों का दिल दुखाकर
खुद को सही साबित करता रहा?
मैंने रावण को देखा है—
कभी दूसरों में,
कभी अपनों में,
और जब सच में अपने भीतर झाँका,
तो वह वहाँ भी खड़ा मिला।
तभी समझ आया,
रावण को देखना आसान है,
उसे दूसरों में खोजना आसान है,
उसके पुतले को जलाना आसान है…
लेकिन अपने भीतर के रावण को पहचानना
इतना आसान नहीं है।
हम हर साल पुतला जलाते हैं,
आतिशबाज़ी करते हैं,
जय श्री राम के नारे लगाते हैं,
और अगले ही दिन
फिर उसी क्रोध, उसी अहंकार,
उसी ज़िद के साथ जीने लगते हैं।
तो बताओ…
उस आग का अर्थ क्या था?
उस विजय का संदेश क्या था?
गर हर साल रावण जलता है,
तो फिर हर साल वही अहंकार क्यों?
वही क्रोध, वही ज़िद,
वही रिश्तों में तकरार क्यों?
कहीं ऐसा तो नहीं
कि हम रावण को जलाते नहीं,
बस उसके पुतले के साथ
अपनी ज़िम्मेदारी भी जला आते हैं?
मैं यह नहीं कहता
कि रावण को जलाना छोड़ दो,
मैं बस इतना कहता हूँ—
उसके पुतले के साथ
अपने भीतर की बुराई को भी थोड़ा तोड़ दो।
एक बार अपने क्रोध को हराकर देखो,
एक बार अपने अहंकार को झुकाकर देखो,
एक बार अपनी ज़िद छोड़कर
किसी अपने को मनाकर देखो।
शायद तब समझ आएगा
कि जीत किसे कहते हैं,
और विजयादशमी का असली अर्थ क्या है।
क्योंकि रावण को जलाने की सबसे बड़ी जीत
मैदान में नहीं,
हमारे भीतर होगी।
रावण तो ज़िंदा है…
क्योंकि हम उसे बाहर ढूँढ़ते हैं,
अपने भीतर नहीं।
और जिस दिन
हम अपने भीतर के रावण को हरा देंगे,
उस दिन शायद किसी पुतले को देखकर
यह सवाल नहीं पूछना पड़ेगा—
सच कहूँ तो मैंने
अपने भीतर के राम को
अपने ही हाथों मार दिया है…
थोड़ा-थोड़ा करके,
अपने लालच में,
अपने लोभ में,
माया के मोह में,
तेरे-मेरे के भेद में,
अपने स्वार्थ और अहंकार में…
अब किस मुँह से कहूँ कि
रावण का अंत चाहता हूँ?
जब अपने ही भीतर के राम को मिटाकर,
मैंने रावण को जीवित रखा है।
रावण को जलाने की चाह तो हर साल रखता हूँ,
मगर अपने भीतर के राम को ज़िंदा रखने की कोशिश कभी नहीं करता…
सच तो यह है— रावण ने मुझे हराया नहीं, मैंने ही अपने भीतर के राम को हारने दिया है।


