धुंधली आँखें और टूटा विश्वास — नशा, ज़िंदगी और परिवार पर एक मार्मिक कहानी
कक्षा 10 के विद्यार्थियों के लिए प्रेरक, भावनात्मक और सीख से भरी कहानी — ताकि हर बच्चा नशे से दूर रहे।
यह कहानी क्यों पढ़ें?
- गलत संगत और छोटी “आदत” कैसे लत बन जाती है — सरल भाषा में समझें।
- नशा सिर्फ़ व्यक्ति नहीं, पूरे परिवार की हंसी छीन लेता है — असर को महसूस करें।
- हिम्मत, काउंसलिंग और परिवार के साथ से वापसी कैसे संभव है — रास्ता जानें।
त्वरित नेविगेशन
1) मासूम शुरुआत
राहुल, जयपुर के एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार का 15 वर्षीय छात्र, कक्षा 10 में पढ़ता था। पिता छोटे व्यापारी, माँ गृहिणी—घर में सादगी थी, पर सपने बड़े। पिता अक्सर कहते, “बेटा, पढ़-लिखकर वह बनना जो मुझे बनने का मौका न मिला।” राहुल तेज दिमाग का था—कक्षा में अव्वल, मैदान में चुस्त। पड़ोस के लोग कहते, “एक दिन यह लड़का इंजीनियर बनेगा।” लेकिन ज़िंदगी की राह पर हर मोड़ सीधा नहीं होता…
2) गलत संगत
मोहल्ले में शाम ढलते ही चौराहे पर बड़ी उम्र के लड़कों की टोली जमा होती—किसी के हाथ में बीड़ी, किसी के पास गुटखा। दो लड़के उसके पड़ोस के थे; मुस्कुराते हुए बोलते, “भाई, सिगरेट नहीं पी तो जवानी का मज़ा क्या!” शुरू में राहुल हँसकर टाल देता, पर धीरे-धीरे वहीँ रुकने लगा। पहले उसने गुटखे की छोटी पुड़िया ली—सोचा, “बस मज़ाक है, बाद में छोड़ दूँगा।” पर मज़ाक धीरे-धीरे ज़रूरत बन गया।
3) बदलाव की आहट
कुछ ही महीनों में राहुल बदलने लगा—आँखों में सुस्ती, किताबों से दूरी, मोबाइल पर फालतू वीडियो। शिक्षक पूछते, “राहुल, पहले तुम टॉप करते थे, अब उत्तर क्यों नहीं?” घर पर माँ नोट करतीं कि जेबखर्च जल्दी खत्म हो जाता। पिता समझ न पाते कि पैसे कहाँ जा रहे हैं। माँ बोलीं, “बेटा, बाहर कम रहा करो; संगत ठीक नहीं।” लेकिन राहुल को अब वही टोली अपनापन देती थी।
4) नशे का जाल
गुटखे-बीड़ी से बढ़कर बात सिगरेट तक पहुँची। सिगरेट से उसे “बड़े होने” का झूठा एहसास मिलता। दोस्तों ने धीरे-धीरे शराब और कफ-सिरप तक पहुँचाया। हर बार वह खुद से कहता—“आज आख़िरी बार”—पर अगले दिन वही धुआँ, वही हँसी, वही खींच। अब उसके कमरे में किताबों की जगह खाली पैकेट और पुड़ियाँ दिखने लगीं। माँ तकिये पर सिर रखकर रोतीं—“क्या यही मेरा वही राहुल है जो डॉक्टर बनना चाहता था?”
5) परिवार पर असर
पिता का विश्वास डगमगाने लगा; अक्सर गुस्से में कहते, “पढ़ाई करेगा भी या आवारा लड़कों संग ही फिरेगा?” घर की शामें, जो पहले हँसी से भरती थीं, अब खामोशी से भारी थीं। बहन उससे कतराने लगी। रिश्तेदारों के सामने माँ कह देतीं—“राहुल पढ़ाई में व्यस्त है।” हकीकत यह थी कि राहुल की लत ने पूरे परिवार की मुस्कान छीन ली थी।
6) टर्निंग पॉइंट — हादसा
एक दिन स्कूल के पीछे दीवार के पास राहुल और दोस्त सिगरेट पीते पकड़े गए। प्रिंसिपल बोले, “तुम्हारा भविष्य बर्बाद हो जाएगा; घरवालों को बुलाओ।” पिता आए तो पूरा स्कूल देख रहा था—उनका चेहरा शर्म से झुका हुआ। लौटते समय उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, “तूने मुझे और मेरी मेहनत को ज़िंदा दफ़्न कर दिया।” ये शब्द राहुल के दिल में तीर की तरह चुभ गए।
7) माँ की पुकार
रात को माँ आईं—आँखें लाल, आवाज़ काँपती। “बेटा, नशा तेरी पढ़ाई ही नहीं बिगाड़ रहा, हमें तोड़ रहा है। तेरे पापा का दिल टूट गया है। हम गरीब हैं, पर अगर तू पढ़-लिख जाए तो हमारी दुनिया बदल सकती है। अगर तू बर्बाद हुआ, तो हम सब बर्बाद हो जाएँगे।” राहुल ने पहली बार देखा—उसकी गलती से पूरा घर कैसे टूट रहा है।
8) संघर्ष और बदलाव
अगले दिन राहुल ने ठान लिया—“अब बहुत हुआ।” पर लत छोड़ना आसान नहीं। शुरुआती दिनों में हाथ काँपते, सिर दर्द, चिड़चिड़ापन—दिमाग फुसफुसाता, “बस एक कश।” तभी उसे पिता का टूटा विश्वास और माँ के आँसू याद आते। उसने स्कूल काउंसलर से बात की। जवाब मिला, “तू अकेला नहीं—हज़ारों बच्चे फँसते हैं, पर जो हिम्मत करता है वही जीतता है।”
राहुल ने सुबह दौड़ना शुरू किया, खेलों में लौट आया, पढ़ाई की तरफ़ फिर से झुका। छोटे-छोटे लक्ष्य बनाए—“आज नहीं”, “इस हफ्ते नहीं”, “इस महीने नहीं”—और हर जीत पर खुद को शाबाशी दी।
9) समाज का आईना
उसी टोली ने फिर पुकारा—राहुल ने सख्ती से मना कर दिया: “तुम्हारे साथ रहकर मैंने अपने माता-पिता का विश्वास खोया; अब और नहीं।” धीरे-धीरे मोहल्ला उसकी नई छवि देखने लगा। जो लोग पहले ताने देते थे, अब प्रेरित होकर बोलते—“शाबाश, बेटा!” स्कूल में शिक्षक खुश थे कि राहुल ने दिशा बदल ली।
10) नई शुरुआत
राहुल ने कक्षा 10 अच्छे अंकों से पास की। पिता की आँखों में फिर गर्व लौटा, माँ ने भगवान का धन्यवाद किया। राहुल समझ चुका था—नशा ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुश्मन है। उसने ठाना कि वह दूसरों को भी जागरूक करेगा। कॉलेज में वह नशा-मुक्ति अभियान से जुड़ा और कहने लगा—“अगर माँ के आँसू और पिता का टूटता मन न दिखता, तो शायद मैं आज यह नहीं होता।”
✨ सीख (Moral)
- नशा व्यक्ति नहीं, पूरे परिवार को दर्द देता है।
- गलत संगत से छोटी आदत भी लत बन जाती है—समझदारी से दोस्त चुनें।
- परिवार का प्यार, काउंसलिंग और खेल-पढ़ाई की दिनचर्या—वापसी का पक्का रास्ता है।
- छोटे लक्ष्य, सच्ची कोशिश और “आज नहीं” की शक्ति—हर लत पर भारी है।
✍️ मेरी नशा-मुक्ति प्रतिज्ञा
- मैं आज से सिगरेट, गुटखा, शराब और किसी भी नशे से दूर रहूँगा/रहूँगी।
- मैं गलत संगत से बचूँगा/बचूँगी और किसी दबाव में आकर कुछ नहीं करूँगा/करूँगी।
- मैं तनाव में खेल, संगीत, पढ़ाई और परिवार से बात करूँगा/करूँगी—न कि नशे की ओर जाऊँगा/जाऊँगी।
- अगर मेरे मित्र नशे में हों, तो उन्हें समझाऊँगा/समझाऊँगी और मदद लेने के लिए प्रेरित करूँगा/करूँगी।
👨👩👧👦 अभिभावक व शिक्षक के लिए छोटे सुझाव
- बच्चों से खुलकर बात करें—डाँट से ज़्यादा संवाद असरदार है।
- खाली समय को खेल, पुस्तक-पाठन और रचनात्मक गतिविधियों से भरें।
- लत के संकेत दिखें तो स्कूल काउंसलर/विशेषज्ञ से जल्दी संपर्क करें।
- परिवार में एकसाथ भोजन/बातचीत का समय—विश्वास बढ़ाता है।
🆘 अगर मदद चाहिए
चाइल्ड हेल्पलाइन: 1098 (अगर कोई बच्चा खतरे/लत/दबाव में हो तो मदद लें)। अपने शहर के काउंसलिंग सेंटर, स्कूल काउंसलर या नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र से भी संपर्क करें।
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